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तुझे याद हो कि न याद हो - अर्श मलसियानी


I came to know about Arsh Malsiyani recently, and took an instant liking to his shayari. Here is some great shayari by Arsh Malsiyani

जो धर्म पे बीती देख चुके, 

इमां पे जो गुजरी जान चुके

इस रामो-रहीम की दुनिया में, 

इंसान का जीना मुश्किल है


वो राह सुझाते  हैं, हमें हजरते-रहबर

जिस राह पे उनको कभी चलते नहीं देखा


अपनी निगाहें-शोख से छुपिये तो जानिये

महफ़िल में हमसे आपने पर्दा किया तो क्या 


पहला सा वह जनून-ए-मुहब्बत नहीं रहा

कुछ-कुछ संभल गए हैं तुम्हारी दुआ से हम 


तेरी दोस्ती पे मेरा यकीं, 

मुझे याद है मेरे हमनशीं

मेरी दोस्ती पे तेरा गुमां, 

तुझे याद हो कि न याद हो

ओ रे माझी - खुदा और नाखुदा


माना तूफ़ाँ के आगे,  नहीं चलता ज़ोर किसी का,

मौजों का दोष नहीं है,  ये दोष है और किसी का

मजधार में नैया डोले,  तो माझी पार लगाये

माझी जो नाव डुबोये,  उसे कौन बचाये।


यह गीत तो हम सभी ने सुना है, इस से एक नाविक या मांझी (sailor) की अहम् भूमिका का आभास होता है। मांझी के लिए नाखुदा शब्द का भी प्रयोग किया जाता है - और जिस प्रकार नाखुदा नैया को पार लगाता है, ईश्वर या खुदा हमारी जीवन की नाव को पार लगाने में मदद करता है। खुदा और नाखुदा शब्दों की समीपता ने बहुत खूबसूरत शायरी को जन्म दिया है।  आज ऐसी ही कुछ नायाब शायरी प्रस्तुत हैं।


तूफां का खौफ किसलिये, कश्ती की फ़िक्र क्यूँ,

बन्दे खुदा सा जब तुझे, नाखुदा मिला।


अच्छा यकीं नही है तो कश्ती डुबो के देख

एक तू ही नाखुदा नही ज़ालिम खुदा भी है।  - कतील शिफई


तुम्ही तो हो, जिसे कहती है नाखुदा दुनिया

बचा सको तो बचा लो कि डूबता हूँ मैं।       - मजाज


 ना कर किसी पे भरोसा, के कश्तियां डूबें

खुदा के होते हुए, नाखुदा के होते हुए।        - अह्मद फराज़ 


 नाखुदा को खुदा कहा है, तो फिर

डूब जाओ, खुदा खुदा न करो।                 - सुदर्शन फाकिर


 किनारों से मुझे ऎ नाखुदा, दूर ही रखना

वहां लेकर चलो, तूफां जहां से उठने वाला है।    - अली अह्मद ज़लीली


अहसान नाखुदा का उठाये मेरी बला

कश्ती खुदा पे छोड दूं, लंगर को तोड दूं।     -ज़ौक़


कुछ और भी हैं काम हमें ऐ गम-ए-जाना



Enjoy your Sunday evening with this great shayari from Habib Zalib.

हसरत है कोई गुंचा हमें प्यार से देखे,
अरमान है कोई फूल हमें दिल से पुकारे।

कुछ और भी हैं काम हमें ऐ गम-ए-जाना,
कब तक कोई उलझी हुई जुल्फों को सवारे।

ये और बात तेरी गली में न आये हम,
लेकिन ये क्या के शहर तेरा छोड़ जाये हम।

जिस की खातिर शहर भी छोड़ा,
जिस के लिए बदनाम हुए,
आज वही हमसे बेगाने बेगाने से रहते हैं।

इक इक करके सारे साथी छोड़ गए,
मुझसे मेरे रहबर भी मुंह मोड़ गए,
सोचता हूँ बेकार गिला है गैरो का,
अपने ही जब प्यार का नाता तोड़ गए।




शब-ए-वस्ल - मिलन की शाम


Time flies when we are together. Many poets have captured this feeling in their writings. Here is a selection of shayari on the topic. 

1. अमीर मीनाई

शब-ए-वस्ल क्या मुख्तसर (short) हो गई

कि आते ही आते सहर हो गई                 


वस्ल का दिन और इतना मुख्तसर

दिन गिने जाते थे जिस दिन के लिये          


इधर देखो हया कैसी शब-ए-वस्ल

उठाओ भी ये परदा दरम्यां से


 2. मीर तक़ी मीर

वस्ल इसका खुदा नसीब करे

मीर जी चाहता है क्या क्या कुछ                


 वस्ल मे रंग उड गया मेरा

क्या जुदाई को मुंह दिखाऊंगा                  


 3. हसरत मोहानी

वस्ल की रात चली एक ना शोखी उनकी

कुछ ना बन आई तो चुपके से कहा मान गये  

हम आह भी भरते हैं तो हो जाते हें बदनाम - अकबर इलाहाबादी


This is a very popular sher used very often to crib about an unfair situation. It was written by the great shayar Akbar Allahabadi.

हम आह भी भरते हैं तो हो जाते हें बदनाम

वो क़त्ल भी करते हें तो चर्चा नहीं होता

Here are some more nuggets from him:


This looks like confessions of a window shopper 🙂

दुनिया में हूँ दुनिया का तलबगार नहीं हूँ

बाज़ार से गुज़रा हूँ खरीदार नहीं हूँ


Authorities say - you seem to be enjoying too much freedom 🙂

इतनी आज़ादी भी गनीमत है

साँस लेता हूँ बात करता हूँ


Nice small verses. I really liked the thought behind these. How can you argue about matters of faith or love?

इश्क नाज़ुक मिजाज़ है बेहद

अक्ल का बोझ उठा नहीं सकता

मजहबी बहस मैने की ही नहीं

फालतू अक्ल मुझमे थी ही नहीं

तन्हाई का आलम


 उसके दुश्मन है बहुत आदमी अच्छा होगा,

वो भी मेरी ही तरह शहर मे तन्हा होगा  - बशीर बद्र् 


अच्छा सा कोई मौसम तन्हा सा कोई आलम,

हर वक़्त का रोना भी बेकार का रोना ह - निदा फाज़िली


 तुम नही गम नही शराब नही, 

ऎसी तनहाई का जवाब नही - सईद राही


 न मिट सकेगी ये तन्हाईया मगर ए दोस्त,

जो तू भी हो तो तबियत ज़रा बहल जाये - मजरूह


 मै तन्हा था मै तन्हा हू, 

तुम आओ तो क्या न आओ तो क्या - अलीम

भरोसा जीतना है तो ये खंजर फेंकने होंगे - अशोक रावत


I am deeply impressed with the feeling of freshness in Ashok Rawat's work. 


भरोसा जीतना है तो ये खंजर फेंकने होंगे

किसी हथियार से अमनो-अमां कायम नही होता

 

एक दिन मज़बूरियाँ अपनी गिना देगा मुझे

जानता हूँ वो कहां जाकर दगा देगा मुझे

 

जुबां पर फूल होते हैं जेहन मे खार होते हैं

कहां दिल खोलने को लोग अब तैयार होते हैं

 

ये सारा वक़्त कागज़ मोडने मे क्यों लगाते हो

कहीं कागज़ की नावों से समंदर पार होते हैं

 

दुश्मनों से भी निभाना चाहते हैं

दोस्त मेरे क्या पता क्या चाहते हैं

 

वो दिया हूँ मै जिसे आंधी बुझायेगी ज़रूर

पर यहां कोइ न कोइ फिर जला देगा मुझे

 

उधर दुनिया कि कोइ ख्वाब सच होने नही देती

इधर कुछ ख्वाब हैं जो चैन से रहने नही देते


Popular Masterpieces by Qateel Shifai


Did you know that Qateel Shifai has written the following popular shers:   

जब भी जी चाहे एक नयी सूरत बना लेते हैं लोग
एक चेहरे पे कई चेहरे लगा लेते हैं लोग 

इक धूप सी जमी है निगाहों के आस पास
ये आप हैं तो आप पे कुर्बान जाइये 

तुम पूछो और मैं ना बताऊँ, ऐसे तो हालात नहीं
इक ज़रा  सा दिल टूटा  है, और तो कोई बात नहीं

वो दिल ही क्या जो तेरे मिलने की दुआ न करे
मैं तुझको भूल कर जिंदा रहूँ खुदा न करे

Enjoy some more masterpieces from the same shayar:

सितम तो ये है के वो भी न बन सका अपना
कबूल हमने किये जिसके गम ख़ुशी की तरह

बेरुखी इससे बड़ी और भला क्या होगी
एक मुद्दत से हमें उसने सताया ही नहीं

सूरज भी आखिर शाम को होता ढलान पर

भारत भूषण आर्य ने क्या खूब कहा है - हमेशा याद रखने के काबिल ख्याल:

सूरज भी आखिर शाम को होता ढलान पर,
पागल है फिर क्यूँ आदमी अपनी उडान पर।

कब आसमां ने पास से देखा ज़मीन को,
चर्चा हुई है दूर से कच्चे मकान पर।

ये अद्ल भी तो आपका क़ातिल से कम नही,
दिन को सुनाई क़ैद क्यूं शब के बयान पर।

वो कर्ज़ मुफलिस का किया पल मे माफ सब,
क्या चीज़ जाने देखकर उसने उठान पर।

उसके सिवा कोई नही गुज़रा गली से है,
वरना कहां से रोशनी मेरे मकान पर।

उम्मीद पे दुनिया क़ायम है


 उम्मीद के बारे में बड़े-बड़े शायरों ने लिखा है - आइये एक झलक देखते हैं -

फैज़ न जाने किसलिये उम्मीद्वार बैठा हूं इक ऎसी राह पे जो तेरी रह गुज़र भी नही

शकील यूँ तो हर शाम उम्मीदो पे गुज़र जाती थी आज कुछ बात है जो शाम पे रोना आया  

इकबाल सौ सौ उम्मीदें बंधती हैं इक इक निगाह पर मुझको न ऐसे प्यार से देखा करे कोई
फानी  कुछ काटी हिम्मत-ए-सवाल मे उम्र कुछ उम्मीद-ए-जवाब मे गुज़री  
गालिब कहते हैं जीते हैं उम्मीद पे लोग हमको जीने की भी उम्मीद नही

A Gem from Zahir Quereshi


अगर सोचिये तो जनम से मरण तक़,
घिरे हम सभी अपनी परछाइयों में।

उन्हे सीपियाँ हाथ कैसे लगगी,
उतरते नही वो जो गहराईयों मे।

सरलता की कीमत समझते नही वो,
जो उलझे रहे सिर्फ चतुराइयों में।

वो कद और स्वर से समझ आ गये थे,
मिले मुंह छुपाकर जो दंगाइयों में।

कुंए से निकलकर गिरे खाइयों में,
पिता चुप हुए तो फंसे भाइयों में।

ननद जी की किससे नज़र लड गई है,
यही खोज चलती है भौजाइयों मे।

कितना सच कहा है !


शायर के एक एक शब्द में कितना गहन अर्थ छुपा होता है - वाह वाह !

टूटे दिलों को जोडना आसान नही है दोस्त
 सर्जन यहां पे फेल है साईंस यहां पे फेल   - फिक़्र्

टूटे हुये रिश्तो ने कईं जख्म दिये है
अब और ज़माने मे किसे दोस्त बनाऊ     - हस्नी सुरूर

टूटे इक ख्वाब तो आँखे नही फोडा करते
जीने वाले कभी जीना नही छोडा करते     - अहमद कमाल

ठोकर से मेरा पांव तो जख्मी हुआ ज़रूर
रस्ते मे जो खडा था वो कोहसार हट गया  - शकेब ज़लाली

ठोकरें खाइये, पत्थर भी हटाते चलिए
आने वालों के लिए राह बनाते चलिए

टूटेंगी ज़ब नींद से पलकें सो जाऊंगा चुपके से
जिस जंगल मे रात पडेगी मेरा घर हो जायेगा  - कैसरूल ज़ाफरी

अकेलेपन से एकांत की ओर


'अकेलापन' इस संसार में
सबसे बड़ी सज़ा है.!
और 'एकांत'
सबसे बड़ा वरदान.!

ये दो समानार्थी दिखने वाले
शब्दों के अर्थ में
आकाश पाताल का अंतर है।

अकेलेपन में छटपटाहट है,
एकांत में आराम.!

अकेलेपन में घबराहट है,
एकांत में शांति।

जब तक हमारी नज़र
बाहरकी ओर है
तब तक हम
अकेलापन महसूस करते हैं.!

जैसे ही नज़र
भीतर की ओर मुड़ी,
तो एकांत
अनुभव होने लगता है।

ये जीवन और कुछ नहीं,
वस्तुतः
अकेलेपन से एकांत की ओर
एक यात्रा ही है.!

ऐसी यात्रा जिसमें,
रास्ता भी हम हैं,
राही भी हम हैं और
मंज़िल भी हम ही हैं.!!

ये जिंदगी है यारों

कभी तानों में कटेगी,
कभी तारीफों में कटेगी,
ये जिंदगी है यारों, पल-पल घटेगी !

बार बार रफू करता रहता हूँ,
जिन्दगी की जेब !!
कम्बखत फिर भी,
निकल जाते हैं,
खुशियों के कुछ लम्हें !!

ज़िन्दगी में सारा झगड़ा ही,
ख़्वाहिशों का है,
ना तो किसी को गम चाहिए,
ना ही किसी को कम चाहिए !

खटखटाते रहिए दरवाजा,
एक दूसरे के मन का,
मुलाकातें ना सही,
आहटें आती रहनी चाहिए !

उड़ जाएंगे एक दिन,
तस्वीर से रंगों की तरह,
हम वक्त की टहनी पर,
बेठे हैं परिंदों की तरह !

ना राज़ है ज़िन्दगी,
ना नाराज़ है ज़िन्दगी,
बस जो है, वो आज है, ज़िन्दगी!

जीवन की किताबों पर,
बेशक नया कवर चढ़ाइये,
पर बिखरे पन्नों को,
पहले प्यार से चिपकाइये !

पाने को कुछ नहीं,
ले जाने को कुछ नहीं,
फिर भी क्यों चिंता करते हो,
इससे सिर्फ खूबसूरती घटेगी,
ये जिंदगी है यारों, पल-पल घटेगी !

उसे कहना ज़रूर

कभी  जो आये मन में  कोई  बात  
उसे  कहना  ज़रूर
न करना  वक्त  का इंतज़ार
न होना  मगरूर ।

जब  पिता  का किया  कुछ
दिल को  छू जाये
तो जाकर  गले उनके
लगना  ज़रूर।
कभी  जो आये मन में  कोई  बात  
उसे  कहना  ज़रूर

बनाये जब  माँ  कुछ तुम्हारे मन का
कांपते हाथों  को
चूम लेना ज़रूर।
कभी  जो आये मन में  कोई  बात  
उसे  कहना  ज़रूर

जब अस्त व्यस्त  होके  बीबी
भूल कर  खुद को
घर  संवारती नज़र  आये
तो धीरे  से उसके कानों में
"बहुत  खूबसूरत  हो "कहना ज़रूर
कभी  जो आये मन में  कोई  बात  
उसे  कहना  ज़रूर

आये जूझ  कर दुनिया  से
हमसफर जब भी
सुकून  भरे कुछ  पल साथ
गुजारना  ज़रूर ।
कभी  जो आये मन में  कोई  बात  
उसे  कहना  ज़रूर

बच्चों को  लगा कर गले
जब तब
व्यस्त  हूँ  पर दूर नहीं  इक पल भी
ये बतलाना  ज़रूर ।
कभी  जो आये मन में  कोई  बात  
उसे  कहना  ज़रूर

जड़ें  कितनी भी गहरी  हों
रिश्तों की सीने में
पनपते रहने की खातिर वक्त वे वक्त
इज़हार की बौछार  करना ज़रूर
कभी  जो आये .......

नहीं  भरोसा  वक्त  का 
साथ किसी  का कब  छूट  जाये
कोई अपना  न जाने  कब रूठ  जाये
तबादला  हो जाये दिल या  दुनिया  से किसी  का
उससे  पहले  दिल की बात
पहुंचाना ज़रूर ।

न करना  वक्त का इंतज़ार
न होना मगरूर
कभी जो आये , मन में
कोई बात उसे कहना ज़रूर

वक़्त ने किया क्या हसीं सितम

    

ज़िन्दगी की दौड़ में,
हम इतने मशगूल रहे,
वक़्त ने जो ज़ुल्म ढाए,
पता ही नहीं चला।

भरे पूरे परिवार में,
चाचा-चाची, दादा-दादी,
कब सब बिछड़े बारी-बारी,
पता ही नही चला।

कभी थे जिम्मेदारी,
हम माँ बाप की,
कब बच्चों के लिए
हुए जिम्मेदार हम,
पता ही नहीं चला।

कंधे पर चढ़ कर,
खेलते थे जो बच्चे,
कब कंधे तक आ गए,
पता ही नहीं चला।

बच्चों को बड़ा करने में,
लगे ही रहे हम,
कब बच्चे घर से दूर गए,
पता ही नहीं चला।

शुरू करके सफर,
किराये के घर से,
कब अपने घर आ गए,
पता ही नहीं चला।

घूमते थे साइकिल के
पैडल मारते हुए,
कब कारों में चलने लगे,
पता ही नहीं चला।

एक दौर था जब
दिन में भी बेखबर सो जाते थे,
कब रातों की उड़ गई नींद,
पता ही नहीं चला।

जिन काले घने बालों पर,
इतराते थे कभी हम,
कब सफेद होकर उड़ गए,
पता ही नहीं चला।

पहले जॉब पर,
फूले न समाये थे,
कब रिटायरमेंट आ गया,
पता ही नहीं चला।

सोचते रहे तमाम उम्र,
कभी तो करेंगे ख्वाईशें पूरी,
कब उम्र तमाम हो गयी,
पता ही नहीं चला।

Poetic Wisdom from Neeraj

Gopaldas Neeraj is my favorite Hindi poet, and I consider myself fortunate that I got the opportunity to hear him recite his poems in a Kavi Sammelan may years back.

Neeraj made a mark in Hindi film music by writing lyrics for many of the songs, but as a poet, he was never really excited by his film work, the literary creations used to give him more satisfaction.

I am a big fan of his landmark song - Karvan Guzar Gaya and have sung it as well.



Neeraj had a very distinct style of poetry. Hidden behind the simple and beautiful words of his poems, often there is deep meaning and wisdom. Here is my attempt to decipher some of his verses.
 
Get rid of excess baggage if you want to be happy. 
जितना कम सामान रहेगा 
उतना सफर आसान रहेगा 
जितनी भारी गठरी होगी 
उतना तू हैरान रहेगा

Learn to face a difficult situation as a challenge. 
जिस वक़्त जीना गैर मुमकिन सा लगे 
उस वक़्त जीना फर्ज़ है इंसान का 
लाज़िम लहर के साथ है तब खेलना 
ज़ब हो समन्दर पे नशा तूफान का

Don’t have any regret about past. 
जीवन कटना था, कट गया 
अच्छा कटा, बुरा कटा यह तुम जानो 
मैं तो यह समझाता हूँ 
कपडा पुराना एक फटना था, फट गया 
जीवन कटना था, कट गया

The irony of life – we don’t know ourselves. 
तमाम उम्र मैं एक अजनबी के घर मे रहा 
सफर न करते हुये भी किसी सफर मे रहा

Religion should preach humanity and brotherhood. 
अब तो मजहब कोइ ऎसा चलाया जाये 
जिसमे इंसान को इंसान बनाया जाये 
जिसकी खुशबू से महक जाये पडोसी का भी घर 
फूल इस किस्म का आँगन मे खिलाया जाये

Spare a thought for the underprivileged. 
जलाओ दिये पर रहे ध्यान इतना 
अंधेरा धरा पर कहीं रह न जाये

How romantic! 
जब चले जायेंगे लौट के सावन की तरह 
याद आयेंगे प्रथम प्यार के चुंबन की तरह 
ज़िक्र जिस दम भी छिडा उनकी गली मे मेरा 
जाने शर्माये वो क्यों गांव की दुल्हन की तरह

जहाँ न जाए रवि, वहां जाए कवि



मित्रों - आपको मेरी ओर से विश्व कविता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ।
  
यह सच है कि कवि हमें एक ऐसे कल्पना के संसार में ले जाता है जिसे हम कभी वास्तविकता में नहीं देख सकते | हिंदी साहित्य का यह सौभाग्य रहा है की इसे अत्यंत विलक्षण प्रतिभा वाले अनेक कवियों का साथ मिला है | सबकी विभिन्न शैली है और सभी ने अलग अलग विषयों पर लिखा हैं | परन्तु इन सभी में क्या कोई apples–to–apples comparison संभव है ?

बचपन में मै धर्मयुग पत्रिका को बड़ी रूचि से पढता था, और इसमें 1976 की होली में प्रसिद्ध कवि ओम प्रकाश आदित्य की एक रचना ने मुझे बड़ा प्रभावित किया | इसमें उन्होंने कल्पना की कि एक उदास रमणी छज्जे पर बैठी है, जिसकी मुखमुद्रा को देखकर ऐसा लगता है, जैसे वह छज्जे से कूद कर आत्महत्या करने वाली हो। तभी वहीँ  से हिन्दी के बारह प्रसिद्ध कविगण एक साथ गुज़र रहे है, जो कि किसी कवि सम्मलेन से आ रहे थे | इस रचना में आदित्य जी ने एक तस्वीर खींच दी है की इन कवियों ने इस स्थिति में क्या कहा – अब आप ही सोचिये, क्या यह घटना वास्तविकता में कभी संभव है? बहुत सुन्दर रचना है - आनंद लीजिये |

मैथिली शरण गुप्त
अट्टालिका पर एक रमणी अनमनी सी है अहो।
किस वेदना के भार से संतप्त हो देवी कहो?
धीरज धरो संसार में किसके नहीं दुर्दिन फिरे‚
हे राम रक्षा कीजिये अबला न भूतल पर गिरे।

सुमित्रानंदन पंत

स्वर्ण–सौध के रजत शिखर पर, चिर नूतन चिर सुंदर प्रतिपल
उन्मन–उन्मन‚ अपलक–नीरव, शशि–मुख पर कोमल कुंतल–पट
कसमस–कसमस चिर यौवन–घट, पल–पल प्रतिपल
छल–छल करती निर्मल दृग–जल, ज्यों निर्झर के दो नीलकमल
यह रूप चपल ज्यों धूप धवल, अतिमौन‚ कौन? रूपसि‚ बोलो‚
प्रिय‚ बोलो न?

रामधारी सिंह दिनकर
दग्ध हृदय में धधक रही, उत्तप्त प्रेम की ज्वाला।
हिमगिरि के उत्स निचोड़‚ फोड़, पाताल बनो विकराला।
ले ध्वंसों के निर्माण त्राण से, गोद भरो पृथ्वी की।
छत पर से मत गिरो, गिरो अंबर से वज्र–सरीखी।

काका हाथरसी
गोरी बैठी छत्त पर‚ कूदन को तैयार
नीचे पक्का फर्श है‚ भली करे करतार
भली करे करतार‚ न दे दे कोई धक्का
ऊपर मोटी नार कि नीचे पतरे कक्का
कह काका कविराय‚ अरी! मत आगे बढ़ना
उधर कूदना‚ मेरे ऊपर मत गिर पड़ना

गोपाल प्रसाद व्यास
छत पर उदास क्यों बैठी है‚ तू मेरे पास चली आ री।
जीवन का सुख–दुख कट जाए‚ कुछ मैं गाऊं‚ कुछ तू गा री।
तू जहां कहीं भी जाएगी‚ जीवन–भर कष्ट उठाएगी।
यारों के साथ रहेगी तो‚ मथुरा के पेड़े खाएगी।

श्यामनारायण पांडेय
ओ घमंड मंडिनी‚ अखंड खंड–खंडिनी।
वीरता विमंडिनी‚ प्रचंड चंड चंडिनी।
सिंहनी की वान से‚ आन–बान–शान से।
मान से‚ गुमान से‚ तुम गिरो मकान से।
तुम डगर–डगर गिरो, तुम नगर–नगर गिरो।
तुम गिरो‚ अगर गिरो‚ शत्रु पर मगर गिरो।

गोपाल प्रसाद नीरज
हो न उदास रूपसी‚ तू मुस्कुराती जा‚
मौत में भी जिंदगी के फूल खिलाती जा।
जाना तो हर एक को एक दिन जहान से‚
जाते–जाते मेरा एक गीत गुनगुनाती जा।

महाकवि निराला
यह मन्दिर की पूजा संस्कृति का शिलान्यास
इसके आँचल में चिति की लीला का विलास
यह मर्माहत हो करे कूद कर आत्मघात
विकसित मानव वक्षस्थल पर धिक् वज्रपात
नर के सुख हित रक्षित अधिकारों के उपाय
युग-युग से नारी का दुख ही पर्याय हाय
बीतेगी, रे, कब बीतेगी यह अन्धरात
अबला कब होगी सबला कब होगा प्रभात।

भवानी प्रसाद मिश्र
गिरो!
तुम्हें गिरना है तो ज़रूर गिरो!
पर कुछ अलग ढंग से गिरो!
गिरने के भी कई ढंग होते हैं
गिरो!
जैसे बूंद गिरती है किसी बादल से
और बन जाती है मोती
बखूबी गिरो हँसते-हँसते मेरे दोस्त
जैसे सीमा पर गोली खाकर सिपाही गिरता है
सुबह की पत्तियों पर ओस की बूंद जैसी गिरो!
गिरो!
पर ऐसे मत गिरो
जैसे किसी की आँख से कोई गिरता है
किसी ग़रीब की झोंपड़ी पर मत गिरो
बिजली की तरह गिरो
पर किसी की हो के गिरो
किसी के ग़म में रो के गिरो
कुछ करके गिरो
फिर चाहे भी भरके गिरो!

देवराज दिनेश
मनहर सपनों में खोयी-सी, कुछ-कुछ उदास, कुछ रोयी सी
यह कौन हठीली छत से गिरने को आतुर
कह दो इससे अपने जीवन से प्यार करे
संघर्ष गले का हार करे
विपदाओं में जीना सीखे
जीवन यदि विष है तो उसको, हँसते-हँसते पीना सीखे
कह दो इससे!

बालकवि बैरागी
गौ…री, हे…मरवण…हे
गौरी हे! मरवण हे!
थारी बातों में म्हारी सब बाताँ, थारो सब कुंजी तालो जी
उतरो-उतरो म्हारी मरवण उतरो, घर को काम सँभालो जी
गौरी हे, मरवण हे।

सुरेन्द्र शर्मा
ऐरी के कररी है?
छज्जै से निचै कुद्दै है
तो पहली मंजिल से क्यूँ कुद्दै
चैथी पे जा
जैसे क्यूँ बेरो तो पाट्टै
के कुद्दी थी।






A Poet with a Difference


Most poets habitually look at the darker side of life, but Kunwar Bechain stands apart on this count. I had an opportunity to listen to his recital in a Kavi Sammelan yesterday and instantly became his fan when I discovered that his poems are full of hope, optimism, and positive thinking. Very often, a small poem can convey a message much more effectively than a long prose. 
Read his poems below and decide for yourself.
 
1. How to be Happy 
सबकी बात माना कर, खुद को भी पहचाना कर।
दुनिया मे जीना है तो, कुछ अम्रत पीना है तो,
दुनिया से लड़ना है तो, अपनी ओर निशाना कर।

तुमने फूल भी काँटे भी, कुछ पाये कुछ बाँटे भी,
तेरे साथ रहे हर दम, मेले भी सन्नाटे भी,
धूप अगर बरसात भी है, दिन है तो फिर रात भी है,
गर्मी सर्दी सहते दिन, नही एक से रहते दिन,
सुख दुख दोनो के घर मे, अपना आना जाना कर।

ये जो यार मोहब्बत है, ये तो कागज़ की छत है,
अंगारों मे बहती है, आँसू पीती रहती है,
रखना इसे हिफाज़त से, इसे बचा हर आफत से
तू है अगर मोहब्बत में, लिख दे ये प्रिय को खत मे,
या तो दीवाना हो जा, या मुझको दीवाना कर।

खुश होना सबसे मिलकर, रहना फूलों सा खिलकर,
सच की राहों पे चलकर, राहों को ही मंज़िल कर,
प्रिय मे अपनी प्यास जगा, मधुर मिलन की आस जगा,
सबको ही मनमीत बना, दर्द मिले तो गीत बना,
दुनिया बहुत सुहानी है, इसको और सुहाना कर।

2. Staying Positive in Adversity
और सब तो ठीक है बस एक यह उलझन ही है,
वो जो मेरा दोस्त है वो मेरा दुश्मन भी है।

दो चार बार हम जो कभी हंस हंसा लिये,
सारे जहाँ ने हाथ मे पत्थर उठा लिये।

रहते हमारे पास तो ये टूटते ज़रूर,
अच्छा किया जो आपने सपने चुरा लिये।

दुनिया ने मुझ पे फैंके थे पत्थर जो बेहिसाब,
मैने उन्ही को जोडकर कुछ घर बना लिये।

संटी की तरह मुझ को मिले ज़िन्दगी के दिन,
मैने उन्ही मे बाँसुरी के स्वर बना लिये।

3. Ultimate Advice on How to deal with Bitterness
रोज़ जब घूमने को जाता हूँ, नीम की पत्तियाँ चबाता हूँ,
जितनी कडवाहटें हैं दुनिया में, मैं उन्ही को दवा बनाता हूँ।