मन से कचरा डिलीट करें


एक दिन देखता हूँ कि मोबाइल चलते-चलते कभी धीरे चलने लगता है, तो कभी हैंग होने लगता है।
एक जानकार ने बताया इसे हलका करना जरूरी है, फोन ओवरलोड हो गया है। इसलिए चलने में दिक्कत करता है।

मैंने बेकार की तस्वीरें, फाइलें, डाटा डीलीट कर दिये। चमत्कार सा हो गया। फोन चलने ही नहीं, दौड़ने लग गया।

फोन क्या चलने लगा, दिमाग का इंजन दौड़ने लगा।

मन में आया कि यदि अनपेक्षित सामाग्री मिटाने से एक निर्जीव फोन तीव्र गति से चल सकता है, तो मन में  भरी हुई, जमी हुई अनावश्यक यादगारें, अप्रिय  घटनाएँ, वैर विरोध की भावनाएँ आदि-आदि सारी नकारात्मकताएँ  मिटा दी जाएँ, भूला दी जाएं, तो आत्मा का पट सद्विचारों,  सकारात्मकताओं के लिए खाली हो जाए।

जीवन बहुत  छोटा है। क्यों न नकारात्मक विचारों के कचरे को मन से डिलीट कर के जीवन को खुल कर आनन्द से जिया जाए?


अकेलेपन से एकांत की ओर


'अकेलापन' इस संसार में
सबसे बड़ी सज़ा है.!
और 'एकांत'
सबसे बड़ा वरदान.!

ये दो समानार्थी दिखने वाले
शब्दों के अर्थ में
आकाश पाताल का अंतर है।

अकेलेपन में छटपटाहट है,
एकांत में आराम.!

अकेलेपन में घबराहट है,
एकांत में शांति।

जब तक हमारी नज़र
बाहरकी ओर है
तब तक हम
अकेलापन महसूस करते हैं.!

जैसे ही नज़र
भीतर की ओर मुड़ी,
तो एकांत
अनुभव होने लगता है।

ये जीवन और कुछ नहीं,
वस्तुतः
अकेलेपन से एकांत की ओर
एक यात्रा ही है.!

ऐसी यात्रा जिसमें,
रास्ता भी हम हैं,
राही भी हम हैं और
मंज़िल भी हम ही हैं.!!