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एक छोटी सी लूट


एक शिक्षक अपने बच्चो से सवाल करता है, अगर आपके पास 86,400 रुपये है और कोई भी लुटेरा 10 रुपये छिनकर भाग जाए तो आप क्या करेंगे?

क्या आप उसके पीछे भागकर लुटे हुवे 10 रुपये वापस पाने की कोशिश करोगे? या आप अपने बचे हुवे 86,390 को हिफाज़त से लेकर अपने रास्ते पर चलते रहेंगे?

कक्षा में सभी ने कहा कि हम 10 रुपये की तुच्छ राशि की अनदेखी करते हुए अपने बचे हुवे रुपये लेकर अपने रास्ते पर चलते रहेंगे।

शिक्षक ने कहा: "आप लोगों का सत्य और अवलोकन सही नहीं है। मैंने देखा है कि ज्यादातर लोग 10 रुपये वापस लेने की फ़िक्र में चोर का पीछा करते हैं और परिणाम के रूप में, उनके बचे हुए 86,390 रुपये भी हाथ से धो बैठते हैं।

शिक्षक को देखते हुए छात्र हैरान होकर पूछने लगे "सर, यह असंभव है, ऐसा कौन करता है?"

शिक्षक ने कहा! "ये 86,400 वास्तव में हमारे दिन के सेकंड में से एक हैं। 10 सेकंड की बात लेकर, या किसी भी 10 सेकंड की नाराज़गी और गुस्से में, हम बाकी के सारे दिन को सोच, कुढ़न और जलने में गुज़ार देते हैं और हमारे बचे हुए 86,390 सेकंड भी नष्ट कर देते हैं।"

चीज़ों को अनदेखा करें। ऐसा न हो कि चन्द लम्हे का गुस्सा , नकारात्मकता आपसे आपके सारे दिन की ताज़गी और खूबसूरती छीनकर ले जाए।

एक छेद भरने की कीमत


एक आदमी ने एक पेंटर को बुलाया अपने घर, और अपनी नाव दिखाकर कहा कि इसको पेंट कर दो। उस पेंटर ने पेंट लेकर उस नाव को  लाल रंग से पेंट कर दिया जैसा कि नाव का मालिक चाहता था। फिर पेंटर ने अपने पैसे लिए और चला गया !

अगले दिन, पेंटर के घर पर वह नाव का मालिक पहुँच गया, और उसने एक बहुत बड़ी धनराशी का चेक दिया उस पेंटर को। 

पेंटर भौंचक्का हो गया, और पूछा - ये किस बात के इतने पैसे हैं ? मेरे पैसे तो आपने कल ही दे दिए थे।

मालिक ने कहा - ये पेंट के नहीं, बल्कि ये उस नाव में जो छेद था, उसको रिपेयर करने की कीमत है।

पेंटर ने कहा - अरे साहब, वो तो एक छोटा सा छेद था, सो मैंने बंद कर दिया था। उस छोटे से छेद के लिए इतना पैसा मुझे, ठीक नहीं लग रहा है।

मालिक ने कहा - दोस्त, तुम्हें पूरी बात पता नहीं। अच्छा मैं विस्तार से समझाता हूँ। 

जब मैंने तुम्हें पेंट के लिए कहा तो जल्दबाजी में तुम्हें ये बताना भूल गया कि नाव में एक छेद है उसको रिपेयर कर देना।

जब पेंट सूख गया, तो मेरे दोनों बच्चे उस नाव को नदी में लेकर नौकायन के लिए  निकल गए।

मैं उस वक़्त घर पर नहीं था, लेकिन जब लौट कर आया और अपनी पत्नी से ये सुना कि बच्चे नाव को लेकर नौकायन पर निकल गए हैं,  तो मैं बदहवास हो गया। क्योंकि मुझे याद आया कि नाव में तो छेद है !

मैं गिरता पड़ता भागा उस तरफ, जिधर मेरे प्यारे बच्चे गए थे। लेकिन थोड़ी दूर पर मुझे मेरे बच्चे दिख गए, जो सकुशल वापस आ रहे थे। अब मेरी ख़ुशी और प्रसन्नता का आलम तुम समझ सकते हो।

फिर मैंने छेद चेक किया, तो पता चला कि, मुझे बिना बताये तुम उसको रिपेयर कर चुके हो।

तो मेरे दोस्त, मेरे बच्चों की जान बचने के महान काम के लिए तो ये कीमत भी बहुत कम हैं।

मेरी औकात नहीं कि उस कार्य के बदले तुम्हे ठीक ठाक कीमत दे पाऊं !

जीवन मे भलाई का काम जब मौका लगे हमेशा कर देना चाहिए, भले ही वो बहुत छोटा सा काम ही क्यों न हो, क्योंकि कभी कभी वो छोटा सा काम भी किसी के लिए बहुत अमूल्य हो सकता है।



अपनी नसीहत पर खुद अमल ?


हाजी साहब की पूरा गाँव बहुत इज्ज़त करता था, क्यूंकि वे गाँव के सबसे समझदार बुज़ुर्ग थे। सभी अपनी समस्याओं को लेकर उनकी मदद के लिए आते। हाजी साहब भी स्वाभाव से परोपकारी थे - सबकी जैसे हो सके मदद करते थे।

एक दिन एक औरत अपने दस साल के बेटे को लेकर उनके पास आई और बोली - हाजी साहब, आप इसे समझाइए ज़रा - ये रात दिन खजूर खाता रहता है - किसी भी चीज़ की ज्यादती सेहत को नुकसान पहुंचा सकती है।

हाजी साहब ने लड़के की ओर देखा - तो लड़का बोला - क्या करूँ मुझे खजूर इतने अच्छे लगते हैं कि बार बार खाने का मन करता है।

हाजी साहब ने अपनी दाढ़ी पर हाथ फेरा और कुछ सोचकर बोले - बहन, आप एक महीने बाद आना - तब मैं आपकी इस समस्या पर कुछ कर पाउँगा।

औरत कुछ समझ नहीं पाई - परन्तु उसे हाजी साहब की अक्लमंदी पर यकीन था, इसलिए बिना कुछ कहे वापस चली गयी।

एक महीने बाद माँ-बेटे वापस आये और आकर बैठ गए। इससे पहले की माँ कुछ कहती - हाजी साहब ने लड़के को पहचानते हुए कहा - बेटे, आप को खजूर बहुत खाने की आदत है न?

लड़के ने हामी में सर हिलाया।

हाजी साहब बोले - देखो बेटा, हद से ज्यादा हर चीज़ नुकसान देती है। तुम्हारा जब भी खजूर खाने का मन करे तो यह ज़रूर सोचना कि इससे मेरी सेहत बिगड़ सकती है। बेहतर होगा कि तुम ये तय कर लो की दिन में कितने खजूर खाने हैं और फिर उस नियम के हद में ही रहने की कोशिश करो - शुरू में मुश्किल होगा पर धीरे-धीरे आसान होता जायेगा। क्या तुम ये कर सकोगे?

लड़के ने कहा - जी हाजी साहब मैं अपनी तरफ से पूरी कोशिश करूँगा। 

इसके बाद माँ-बेटा चले गए।

हाजी साहब का शागिर्द जो उनके साथ ही बैठा था अपनी जिज्ञासा रोक नहीं पाया। उसने पूछा - माफ़ करें हाजी साहब, यही बात आप उसे एक महीने पहले भी बता सकते थे, फिर आपने एक महीने का वक़्त क्यूँ माँगा? मैं कुछ समझ नहीं पा रहा हूँ।

हाजी साहब बोले - जब वो पहली बार मेरे पास आया और उसने बताया की उसे खजूर खाने की लत है, तो मुझे ये अहसास हुआ की मुझे खुद बहुत खजूर खाने की आदत है। इस एक महीने में मैंने पहले अपनी आदत पर काबू पाया, ताकि इस काबिल बन सकूँ कि लड़के को इस बारे में समझा सकूँ।

इस छोटी से कहानी में एक बड़ी सीख छुपी है - दूसरो को नसीहत देने से पहले ये ज़रूरी है कि हम खुद उस पर अमल करे। अपने व्यवहार को आदर्श बनाकर ही हम किसी को सीख देने की सोच सकते हैं। 

क्या है सुख? कैसे इसे हासिल करें ?

 
क्या है सुख?
बुखार नहीं है, सर्दी खांसी नहीं है,
मुंह में स्वाद भी है, खुशबू भी ले सकते है
यही तो है सुख !

पिछले कई महीनो से चल रहे अभूतपूर्व कोरोना महामारी के प्रकोप ने हमें अचानक यह अहसास दिला दिया है कि वास्तव में जीवन में ऐसे कितने ही छोटे छोटे सुख भरे हुए हैं - परन्तु हम उन्हें नकार कर सिर्फ यही देखते रहते हैं कि हमारे जीवन में क्या कमी है - या कौन सी इच्छा पूरी होनी बाकी है | खुश रहना हमारे अपने हाथ में है, यदि हम अपने मन से नकारात्मक विचार निकाल दें | ज़रा नीचे लिखे सुझावों पर विचार कीजिये - शायद ये मददगार हो सकें |

सबसे पहले सोच बदलें 
  • जीवन में सभी चीजें अस्थायी हैं। यदि सब कुछ ठीक ठाक चल रहा है, तो इसका आनंद लेना सीखिए |
  • यदि कुछ गलत घट भी रहा है, तो चिंता मत कीजिये, यह वक़्त जल्द ही गुज़र जाएगा |
  • चिंता कभी न करें क्यूंकि चिता कल की मुसीबतों को दूर नहीं करती, पर वह आज की शांति जरूर छीन लेती है।
  • ज़रा सोचिये - कार की विंडशील्ड इतनी बड़ी और रियर व्यू मिरर इतना छोटा क्यों होता है? क्योंकि आगे बढ़ने के लिए हमेशा सामने देखना ज़रूरी है | इसी तरह हमाराअतीत कभी हमारे वर्तमान से ज्यादा महत्वपूर्ण नहीं होता। सामने देखिये और आगे बढिए। 

आपकी पहुँच ऊपर तक है, उसका प्रयोग करें 
  • अगर आपको अपनी क्षमताओं में विश्वास है तो परमेश्वर भी आपकी समस्याओं को हल करता है। कठिन समय में उनसे मदद लेने में न हिचकें |
  • अक्सर जब हम उम्मीद खो बैठते हैं और लगता है कि अब अंत आ पहुंचा - उस समय ईश्वर ऊपर से मुस्कराता है और कहता है, आराम से डियर, कोई अंत नहीं, यह सिर्फ एक मोड़ है ! 
  • परन्तु याद रखें कि प्रार्थना को सिर्फ स्टेपनी की तरह मुसीबत के समय ही प्रयोग न करें | इसको जीवन का स्टीयरिंग व्हील बनायें, जो जिंदगी के सफ़र में आपको सही दिशा में ले जाए |
  • कभी कभी दूसरो के लिए भी प्रार्थना करें क्यूंकि जब आप दूसरों के लिए प्रार्थना करते हैं तो भगवान आपकी सुनता है और उनकी मदद करता है । 

अच्छे दोस्तों को न भूलें 
  • आपके दोस्तों का साथ कई बार आपको कठिन से कठिन परिस्थिति से जूझने का हौसला देता है |
  • जब कभी आपकी समस्या का अचानक समाधान हो जाता है तो याद रखें कि उस समय आप के लिए भी शायद कोई मित्र प्रार्थना कर रहा हो | 
  • परन्तु एक सच्ची और अच्छी दोस्ती को विकसित करना आसान नहीं है - सच्ची दोस्ती एक किताब की तरह है, जिसे लिखने में कई साल खर्च हो जाते हैं लेकिन इसे जलाने में कुछ ही सेकंड लगता है |  
  • नए दोस्त मिल जाने पर पुराने दोस्तों को न भूलें | पुराने दोस्त सोने की तरह होते हैं और नए मित्र हीरे जैसे | यदि आपको एक हीरा मिल जाए तो, सोने को नहीं भूलें, क्योंकि हीरे की पकड़ बनाने के लिए हमेशा सोने के बेस की जरूरत होती है | 

छोटी छोटी बातें



यदि हम अपने व्यवहार में कुछ छोटी छोटी बातों का ध्यान रखें तो इससे हमारे अपने मित्रों, सहकर्मियों, और परिवार जनों के साथ सम्बन्ध और भी मधुर हो सकते हैं | एक नज़र इन सुझावों पर डालिए और सोचिये कि इनमे से कितनी बातों का हम पालन कर पाते हैं जब हम दूसरों से मिलते हैं ?














































मन से कचरा डिलीट करें


एक दिन देखता हूँ कि मोबाइल चलते-चलते कभी धीरे चलने लगता है, तो कभी हैंग होने लगता है।
एक जानकार ने बताया इसे हलका करना जरूरी है, फोन ओवरलोड हो गया है। इसलिए चलने में दिक्कत करता है।

मैंने बेकार की तस्वीरें, फाइलें, डाटा डीलीट कर दिये। चमत्कार सा हो गया। फोन चलने ही नहीं, दौड़ने लग गया।

फोन क्या चलने लगा, दिमाग का इंजन दौड़ने लगा।

मन में आया कि यदि अनपेक्षित सामाग्री मिटाने से एक निर्जीव फोन तीव्र गति से चल सकता है, तो मन में  भरी हुई, जमी हुई अनावश्यक यादगारें, अप्रिय  घटनाएँ, वैर विरोध की भावनाएँ आदि-आदि सारी नकारात्मकताएँ  मिटा दी जाएँ, भूला दी जाएं, तो आत्मा का पट सद्विचारों,  सकारात्मकताओं के लिए खाली हो जाए।

जीवन बहुत  छोटा है। क्यों न नकारात्मक विचारों के कचरे को मन से डिलीट कर के जीवन को खुल कर आनन्द से जिया जाए?


क्या Communication Gap है

अरविन्द और अनिल को बचपन से ही एक दूसरे की बात समझने मे बहुत कठिनाई होती है। बचपन में एक बार दोनो डाक्टर-मरीज़ खेल रहे थे, अनिल डाक्टर बना और अरविन्द मरीज बनकर उसके पास पहुँचा:

अनिल:  तबियत कैसी है?

अरविन्द:    पहले से ज्यादा खराब है।

अनिल:  दवाई खा ली थी?

अरविन्द:    खाली नहीं थी भरी हुई थी।

अनिल: मेरा मतलब है दवाई ले ली थी?

अरविन्द:    जी आप ही से तो ली थी।

अनिल:  अरे भाई! दवाई पी ली थी?

अरविन्द:    नहीं जी दवाई नीली थी।

अनिल: ओफ्फोह! दवाई को पी लिया था.?

अरविन्द:    नहीं जी पीलिया तो मुझे था।

अनिल: हूज़ूरे आला! दवाई को खोल के मुँह में रख लिया था?

अरविन्द:    नहीं आप ही ने तो कहा था कि फ्रिज में रखना।

अनिल: ज़नाब क्या मार खाने का इरादा है?

अरविन्द:   नहीं दवाई खानी है।

अनिल: मेहरबानी करके यहाँ से निकल जाईये।

अरविन्द:   जा रहा हूँ, फिर कब आऊँ?

अनिल: मरने के बाद।

अरविन्द:   आपके या मेरे?

प्रेरणा दायक विचार

अकसर लोग बेहतर की तलाश मे बेहतरीन खो देते हैं |

नीयत साफ और मकसद सही हो तो यकीनन किसी न किसी रूप में ईश्वर भी आपकी मदद करते हैं |

अच्छाई एक न एक दिन अपना असर जरूर दिखाती है |

हर नजर में मुमकिन नहीं है बेगुनाह रहना, वादा ये करें की खुद की नजर में बेदाग रहें |

हम जब किसी का अच्छा कर रहे होते हैं तो हमारे लिए भी कुछ अच्छा हो रहा होता है |

दुनिया में हर चीज ठोकर लगने से टूट जाती है, एक कामयाबी ही है जो ठोकर खाकर ही मिलती है |

माना कि आप किसी का भाग्य नहीं बदल सकते लेकिन अच्छी प्रेरणा और सही राय देकर किसी का मार्ग दर्शन तो कर सकते हैं |

किस्मत आपके हाथ में नहीं होती पर निर्णय आपके हाथ में होता है, आपका निर्णय आपकी किस्मत बदल सकता है |

रुमाल से आंसू पोंछे जा सकते हैं किंतु क्षमा और प्रेम आंसुओं के कारण को ही समाप्त कर देते हैं |

सेलो टेप हो या सम्बन्ध अंत में ऐसे न छोड़ देना, कि वापिस ढूंढ़ने के लिये खरोचना पड़े |

अपना दर्द सबको न बताएं क्योंकि सबके घर मरहम नहीं होता मगर नमक हर एक के घर होता है |

संबंध कभी भी सबसे जीतकर नहीं निभाए जा सकते |

जैसे हो वैसे ही रहिये क्योंकि original की कीमत Copy से अधिक होती हैं |

मुझे वो रिश्ते पसंद है जिनमें "मैं" नहीं "हम" हो |

समय जब निर्णय करता है तब गवाहों की जरूरत नहीं होती |

परेशानी हालात से नही, ख़यालात से पैदा होती है |

चिंता इतनी कीजिए की काम हो जाए, पर इतनी नही की जिंदगी तमाम हो जाए |

स्वभाव भी इंसान की अपनी कमाई हुयी सबसे बड़ी दौलत है |

तारीफ़ अपने आपकी करना फ़िज़ूल है, ख़ुशबू तो ख़ुद ही बता देती है, कौन सा फ़ूल है |

सुखी वृद्धावस्था का रहस्य - आत्मनिर्भर बनिए

मेरी दिल्ली से पुणे की फ्लाइट उड़ान भर चुकी थी | मेरे साथ में एक वृद्ध दंपत्ति बैठा हुआ था | पत्नी खिड़की की ओर बैठी थीं, पति बीच में और मै आयेल की सीट पर था।

सज्जन की उम्र करीब 80 साल रही होगी। मैंने पूछा नहीं लेकिन उनकी पत्नी भी 75 पार ही रही होंगी। उम्र के असर  को छोड़ दें,  तो दोनों करीब करीब फिट लग रहे थे।

उड़ान भरने के साथ ही पत्नी ने कुछ खाने का सामान निकाला और पति की ओर किया। पति कांपते हाथों से धीरे-धीरे खाने लगे। फिर फ्लाइट में जब भोजन सर्व होना शुरू हुआ तो उन लोगों ने राजमा-चावल का ऑर्डर किया। दोनों बहुत आराम से राजमा-चावल खाते रहे। मैंने पता नहीं क्यों पास्ता ऑर्डर कर दिया था। खैर, मेरे साथ अक्सर ऐसा होता है कि मैं जो ऑर्डर करता हूं, मुझे लगता है कि सामने वाले ने मुझसे बेहतर ऑर्डर किया है।

अब बारी थी कोल्ड ड्रिंक की।  पीने में मैंने कोका कोला का ऑर्डर दिया था।  अपने कैन के ढक्कन को मैंने खोला और धीरे-धीरे पीने लगा।

 उन सज्जन ने कोई जूस लिया था।  खाना खाने के बाद जब उन्होंने जूस की बोतल के ढक्कन को खोलना शुरू किया तो ढक्कन खुले ही नहीं। सज्जन कांपते हाथों से उसे खोलने की कोशिश कर रहे थे। मैं लगातार उनकी ओर देख रहा था। मुझे लगा कि ढक्कन खोलने में उन्हें मुश्किल आ रही है तो मैंने शिष्टाचार हेतु कहा...
"लाइए, मैं खोल देता हूं।"

सज्जन ने मेरी ओर देखा, फिर मुस्कुराते हुए कहने लगे, "बेटा ढक्कन तो मुझे ही खोलना होगा।"

मैंने कुछ पूछा नहीं, लेकिन सवाल भरी निगाहों से उनकी ओर देखा।

यह देख, सज्जन ने आगे कहा, "बेटा, आज तो आप खोल देंगे।  लेकिन अगली बार?  कौन खोलेगा?

इसलिए मुझे खुद खोलना आना चाहिए।"

पत्नी भी पति की ओर एकटक देख रही थीं। जूस की बोतल का ढक्कन उनसे अभी भी नहीं खुला था। पर पति लगे रहे और बहुत बार कोशिश कर के उन्होंने ढक्कन खोल ही दिया।

दोनों आराम से जूस पीने लगे ।

मुझे दिल्ली से पुणे की इस उड़ान में  ज़िंदगी का एक अहम सबक मिला।

सज्जन ने मुझे बताया कि उन्होंने  ये नियम बना रखा है  कि अपना हर काम वो खुद करेंगे। घर में बच्चे हैं, भरा पूरा परिवार है। सब प्रेमपूर्वक साथ ही रहते हैं। पर अपनी रोज़ की ज़रूरत के लिये वे  सिर्फ पत्नी की मदद ही लेते हैं, बाकी किसी की नहीं। वो दोनों एक दूसरे की ज़रूरतों को समझते हैं

सज्जन ने मुझसे कहा, "मेरा मानना है कि जितना संभव हो, अपना काम खुद करना चाहिए। एक बार अगर काम करना छोड़ दूंगा, दूसरों पर निर्भर हुआ तो समझो बेटा कि बिस्तर पर ही पड़ जाऊंगा। फिर मन हमेशा यही कहेगा कि ये काम इससे करा लूं, वो काम उससे।"

"फिर तो चलने के लिए भी दूसरों का सहारा लेना पड़ेगा। अभी चलने में पांव कांपते हैं, खाने में भी हाथ कांपते हैं, पर जब तक आत्मनिर्भर रह सको, रहना चाहिए।"

"अभी हम पुणे जा रहे हैं, दो दिन वहीं रहेंगे। हम महीने में एक दो बार ऐसे ही घूमने निकल जाते हैं। बेटे-बहू कहते हैं कि अकेले मुश्किल होगी, पर उन्हें कौन समझाए कि मुश्किल तो तब होगी जब हम घूमना-फिरना बंद करके खुद को घर में कैद कर लेंगे।"

"पूरी ज़िंदगी खूब काम किया। अब सब बच्चों को सौंप कर अपने लिए महीने के पैसे तय कर रखे हैं। और हम दोनों उसी में आराम से घूमते हैं। जहां जाना होता है एजेंट टिकट बुक करा देते हैं। घर पर टैक्सी आ जाती है। वापिसी में एयरपोर्ट पर भी टैक्सी ही आ जाती है। होटल में कोई तकलीफ होनी नहीं है।"

"स्वास्थ्य, उम्रनुसार, एकदम ठीक है।  कभी-कभी जूस की बोतल ही नहीं खुलती। पर थोड़ा दम लगाओ,  तो वो भी खुल ही जाती है।"

यह कहकर वो बुजुर्ग मुस्कुरा दिए।

मेरी तो आखेँ ही खुल की खुली रह गई।

मैंने तय किया था कि इस बार की उड़ान में लैपटॉप पर एक पूरी फिल्म देख लूंगा।  पर यहां तो मैंने जीवन की फिल्म ही देख ली। एक वो  फिल्म जिसमें जीवन जीने का संदेश छिपा था।

जब तक हो सके, आत्मनिर्भर रहिये। अपना काम, जहाँ तक संभव हो, स्वयं ही कीजिये।


सुन्दर विचारों की माला


I am grateful to my friends, who keeps sending me beautiful and inspiring messages. I am bringing a compilation of some of the best messages from them:                      

Self-Management 


नाम और पहचान भले ही छोटी हो,
मगर खुद की होनी चाहिए।                       

कुछ भी अच्छा या बुरा नहीं होता,
बस सोच उसे ऐसा बनाती है.                       

एक शख्स बनकर ना जिओ,
बल्कि एक शख्सियत बनकर जिओ...
क्योंकि शख्स तो मर जाता है,
पर शख्सियत हमेशा जिंदा रहती है... 


अगर दुनिया आपकी ईमानदारी पर संदेह करे तो दुखी नहीं होना चाहिये,
क्योंकि संदेह सोने की शुद्धता पर किया जाता है, लोहे की नहीं ।

किसी काम को करने के बारे में बहुत देर तक सोचते रहना
अक्सर उसके बिगड़ जाने का कारण बनता है।

वो शख्स जिंदगी में कभी नहीं हार सकता
जो दर्द बर्दाश्त करना जानता हों


जिनका स्वभाव अच्छा होता है।
उन्हें कभी प्रभाव दिखाने की जरूरत नहीं होती है।       


Relationships

रिश्ते एहसास के होते हैं,
अगर एहसास हो तो अजनबी भी अपने होते हैं,
और अगर एहसास ना हो तो अपने भी अजनबी हो जाते हैं।

खुद का मान अगर चाहो तो औरों का भी मान रखो..
कहने को अगर जीभ मिली है तो सुनने को भी कान है.                       

युद्ध को समाप्त करने का सबसे तेज़ तरीका है उसे हारना,
ख़ास तौर पर तब जब वो युद्ध अपनों के साथ हो।

दूसरों को नसीहत देना तथा आलोचना करना सबसे आसान काम है,
सबसे मुश्किल काम है चुप रहना और आलोचना सुनना !    

कोई हमारी गलतियां निकालता है तो हमें खुश होना चाहिए,
क्योंकि कोई तो है जो हमें पूर्ण दोष रहित बनाने के लिए अपना दिमाग और समय दे रहा है |

बिखरने" के बहाने तो बहुत मिल जायेंगे,
आओ हम "जुड़ने" के अवसर खोजे

अगर एक हारा हुआ इंसान हारने के बाद भी मुस्करा दे,
तो जीतने वाले को भी अपना बना लेता है|

तोड़ कर जोड़ लो चाहे हर चीज़ दुनिया की,
सब की मरम्मत मुमकिन है एतबार के सिवा |

किसी की "टाँग" खींचने के बजाय,
किसी का "हाथ" खींच कर उपर लेना बेहतर होता है !

Happiness

ख़ुशी पैसों पर नहीं, परिस्थितियों पर निर्भर करती है...
एक बच्चा गुब्बारा ख़रीद कर ख़ुश था तो दूसरा उसे बेच कर |

मिलता तो बहुत कुछ है इस ज़िन्दगी में,
बस हम गिनती उसी की करते है जो हासिल ना हो सका,
क्यों न जो है उसमे ख़ुश रहना सीखे?

जरूरी नहीं कि मिठाई खिलाकर दूसरों का मुंह मीठा करें,
आप मीठा बोलकर भी लोगों को खुशियाँ दे सकते हैं....

यदि आप अपनी ज़िंदगी से खुश नहीं हो,
तो सोचे उन लोगों के बारे में जो आप जैसी ज़िंदगी जीने के लिए तरसते है।    

मोबाइल से पहले



चश्मा साफ़ करते हुए उस बुज़ुर्ग नेअपनी पत्नी से कहा, "हमारे ज़माने में मोबाइल नहीं थे.. वरना हम भी आज की तरह हमेशा touch में रहते |"

पत्नी मुस्कुराई और बोली, "पर ठीक पाँच बजकर पचपन मिनट पर मैं पानी का ग्लास लेकर दरवाज़े पे आती  और आप आ पहुँचते.."

पति, "हाँ मैंने तीस साल नौकरी की पर आज तक मैं ये नहीं समझ पाया कि मैं आता इसलिए तुम पानी लाती थी या तुम पानी लेकर आती थी इसलिये मैं आता था.."

पत्नी, "हाँ.. और याद है.. तुम्हारे रिटायर होने से पहले जब तुम्हें डायबीटीज़ नहीं थी और मैं तुम्हारी मनपसन्द खीर बनाती तब तुम कहते कि आज दोपहर में ही ख़याल आया कि खीर खाने को मिल जाए तो मज़ा आ जाए.."

पति, "हाँ.. सच में.. ऑफ़िस से निकलते वक़्त जो भी सोचता, घर पर आकर देखता कि तुमने वही बनाया है.."

पत्नी, "और तुम्हें याद है जब पहली डिलीवरी के वक़्त मैं मैके गई थी और जब दर्द शुरु हुआ मुझे लगा काश..
तुम मेरे पास होते.. और घंटे भर में तो जैसे कोई ख़्वाब हो, तुम मेरे पास थे.."

पति, "हाँ.. उस दिन यूँ ही ख़याल आया कि ज़रा देख लूँ तुम्हें !!"

पत्नी, "और जब तुम मेरी आँखों में आँखें डाल कर कविता की दो लाइनें बोलते.."

पति, "हाँ और तुम शर्मा के पलकें झुका देती और मैं उसे कविता की LIKE समझता !!"

पत्नी, "और हाँ जब दोपहर को चाय बनाते वक़्त मैं थोड़ा जल गई थी और उसी शाम तुम बर्नोल की ट्यूब अपनी
ज़ेब से निकाल कर बोले, इसे अलमारी में रख दो.."

पति, "हाँ.. पिछले दिन ही मैंने देखा था कि ट्यूब ख़त्म हो गई है,पता नहीं कब ज़रूरत पड़ जाए, यही सोच कर मैं
ट्यूब ले आया था !!"

पत्नी, "तुम कहते आज ऑफ़िस के बाद तुम वहीं आ जाना सिनेमा देखेंगे और खाना भी बाहर खा लेंगे.."

पति, "और जब तुम आती तो जो मैंने सोच रखा हो तुम वही साड़ी पहन कर आती.."

फिर नज़दीक जा कर उसका हाथ थाम कर कहा, "हाँ हमारे ज़माने में मोबाइल नहीं थे.. वरना हम भी आज की तरह हमेशा touch में रहते |

पर..

हम दोनों साथ थे !!"

पत्नी, "आज बेटा और उसकी बहू TOUCH में तो रहते हैं पर..
बातें नहीं व्हाट्सएप होता है..
लगाव नहीं टैग होता है..
केमिस्ट्री नहीं कमेन्ट होता है..
लव नहीं लाइक होता है..
मीठी नोकझोंक नहीं अनफ़्रेन्ड होता है..

उन्हें बच्चे नहीं कैन्डीक्रश सागा,
टैम्पल रन और सबवे सर्फ़र्स चाहिए.."

पति, "छोड़ो ये सब बातें.. हम अब VIBRATE मोड पे हैं.. हमारी बैटरी भी 1 लाइन पे है..

अरे..!! कहाँ चली..?"

पत्नी, "चाय बनाने.."

पति, "अरे मैं कहने ही वाला था कि चाय बना दो ना.."

पत्नी, "पता है.. मैं अभी भी COVERAGE AREA में हूँ और मैसेज भी आते हैं.."

पति, "हाँ हमारे ज़माने में मोबाइल नहीं थे..!! वरना हम भी आज की तरह हमेशा touch में रहते |"

और दोनों हँस पड़े..


सच्ची निष्ठा

दो गाँवो के बीच एक नदी थी। नदी किनारे एक वृक्ष के नीचे एक संत कईं दिनों से माला फेरते हुऐ अखंड जाप मे लीन थे। उनका संकल्प था एक लाख मालाओ को पूरा करना।
 
उस गाँव की एक अहीर बाला दूध बेचने के लिये रोजाना दूसरे गाँव जाती थी। नदी किनारे आकर अपने दूध का डिब्बा खोलती और उसमें से एक लोटा दूध निकालती। दूध के डिब्बे में एक लोटा पानी मिलाती और नदी पार के गाँव की ओर चल पड़ती दूध बेचने।

यह उसकी रोज की दिनचर्या थी।

संत इस अहीर बाला की गतिविधियों को कई दिनो तक आश्चर्य से देखते रहे। एक दिन उनसे रहा नहीं गया और उन्होने बाला से पूछा,

"बेटी सुनो!"

"हाँ! बाबा। बोलिये ना।"

"बुरा न मानो तो तुमसे एक बात पूछना चाहता हूँ।"

"पूछिये ना बाबा। आपकी बात भी कोई बुरा मानने की होती है क्या?"

"बेटी! मैं रोज देखता हूँ। तुम यहाँ आती हो। दूध के डिब्बे में से एक लोटा दूध निकालती हो और डिब्बे में एक लोटा पानी मिला देती हो? क्यों करती हो तुम ऐसा?"

लड़की ने नज़रें नीची कर ली। कहा, "बाबा! मैं जिस गाँव में दूध बेचने जाती हूँ ना, वहाँ मेरी सगाई पक्की हुई है। मेरे मंगेतर वहीं रहते हैं। जबसे सगाई हुई है मैं रोज एक लोटा दूध उन्हें लेजाकर देती हूँ। दूध कम न पड़े इसलिये एक लोटा पानी डिब्बे में मिला देती हूँ।"

"पगली तू ये क्या कर रही है? कभी हिसाब भी लगाया है तूने? कितना दूध अपने मंगेतर को दिया?"

"लड़की नें नज़रें तनिक उठाते हुऐ उत्तर दिया, "बाबा! जब सारा जीवन ही उसे सौंपने का फैसला हो गया तो फिर हिसाब क्या लगाना? जितना दे सकी दिया, जितना दे सकूंगी देती रहूंगी।"

उस लडकी के अपने मंगेतर के प्रति भाव देख संत के हाथ से माला छूट कर नदी में जा गिरी। उन्होने तुरंत उस अहीर बाला के पाँव पकड़ लियेे और कहा बेटी! तूने तो मेरी आँखें ही खोल दी। माला का हिसाब लगाते लगाते मैंने सारा जीवन व्यर्थ कर दिया। जब सारा जीवन ही उसे सौंप दिया तो क्या हिसाब रखना? कितनी माला फेर ली?

यही है सार - सच्चे प्रेम, श्रद्धा, लगन, भक्ति और निष्ठा का - इसमे हिसाब-किताब का क्या काम?

काँच और हीरा

एक राजा का दरबार लगा था।

क्योंकि सर्दी का दिन था इसलिये दरबार खुले मे लगा था.सभी सुबह की धूप मे बैठे थे।

उसी समय एक व्यक्ति आया और प्रवेश माँगा..

प्रवेश मिल गया तो उसने कहा, "मेरे पास दो वस्तुएं हैं, मै हर राज्य के राजा के पास जाता हूँ और अपनी वस्तुओं को रखता हूँ पर उन्हें कोई परख नही पाता, सब हार जाते है और मै विजेता बनकर घूम रहा हूँ।  अब आपके नगर मे आया हूँ |"

राजा ने बुलाया और कहा “क्या वस्तु है?”

तो उसने दोनो वस्तुएं एक मेज पर रख दीं..

वे दोनों वस्तुएं बिल्कुल समान आकार, समान रुप रंग, समान प्रकाश सब कुछ नख-शिख समान था।

राजा ने कहा ये दोनो वस्तुएं तो एक हैं |

तो उस व्यक्ति ने कहा,"हाँ दिखाई तो एक सी ही देती है लेकिन हैं भिन्न |

इनमें से एक है बहुत कीमती हीरा,और एक है काँच का टुकडा। लेकिन दोनों का रूप रंग सब एक है | कोई आज तक परख नही पाया क़ि कौन सा हीरा है और कौन सा काँच का टुकड़ा | कोई परख कर बताये कि कौन सा हीरा है और कौन सा काँच ?

अगर परख खरी निकली...
तो मैं हार जाऊंगा और यह कीमती हीरा मै आपके राज्य की तिजोरी मे जमा करवा दूंगा |

पर शर्त यह है क़ि यदि कोई नहीं पहचान पाया तो इस हीरे की जो कीमत है उतनी धनराशि आपको
मुझे देनी होगी |

मैं इसी प्रकार से कई राज्यों से जीतता आया हूँ |"

राजा ने कहा,"मै तो नही परख सकूगा |"

दीवान बोले,"हम भी हिम्मत नही कर सकते क्योंकि दोनो बिल्कुल समान हैं |"

सब हारे कोई हिम्मत नही जुटा पा रहा था |

हारने पर राजा की प्रतिष्ठा गिर जायेगी, इसका सबको भय था |

कोई व्यक्ति पहचान नही पाया...


आखिरकार पीछे थोडी हलचल हुई |

एक अंधा आदमी हाथ मे लाठी लेकर उठा और उसने कहा कि मुझे महाराज के पास ले चलो |

मैने सब बाते सुनी है, और यह भी सुना है कि, कोई परख नही पा रहा है|

एक अवसर मुझे भी दो...

एक आदमी के सहारे वह राजा के पास पहुंचा |

उसने राजा से प्रार्थना की, "मै तो जनम से अंधा हू, फिर भी मुझे एक अवसर दिया जाये, जिससे मै भी एक बार अपनी बुद्धि को परखूँ, और हो सकता है कि सफल भी हो जाऊं |"

राजा ने कहा क़ि ठीक है |

तो तब उस अंधे आदमी को दोनो चीजे छुआ दी गयी और पूछा गया |

इसमे कौन सा हीरा है और कौन सा काँच ?

कथा कहती है कि उस अंधे आदमी ने एक क्षण में बता दिया कि यह हीरा है और यह काँच !!

जो आदमी इतने राज्यो को जीतकर आया था, वह नतमस्तक हो गया और बोला..

“एकदम सही है! आपने पहचान लिया ! धन्य हो आप !!

अपने वचन के मुताबिक यह हीरा मै आपके राज्य की तिजोरी मे दे रहा हूँ"

सब बहुत खुश थे कि कम से कम कोई तो मिला परखने वाला |

तब राजा ने उस अंधे व्यक्ति से एक जिज्ञासा जताई कि तुमने यह कैसे
पहचाना कि यह हीरा है और वह काँच ?

अंधे ने कहा:

"सीधी सी बात है राजन, धूप मे हम सब बैठे है | मैने दोनो को छुआ..
जो ठंडा था वह हीरा |
जो गरम हो गया वह काँच |"

मानव जीवन मे भी..
जो बात बात मे गरम हो जाये, उलझ जाये..
वह व्यक्ति "काँच" हैं

और
जो विपरीत परिस्थिति मे भी कूल रहे..
वह व्यक्ति "हीरा" है !!

फोकस का महत्त्व



किसी भी लक्ष्य को पाने के लिए फोकस और एकाग्रता का होना बहुत जरुरी है। यह सुन्दर कथा इस तथ्य को बहुत खूबसूरती से प्रस्तुत करती है। 
  एक दिन एक व्यक्ति की घड़ी गुम हो गई। वैसे तो घड़ी कीमती नहीं थी, पर वह उसे उसकी पत्नी ने शादी की पहली सालगिरह पर भेंट की थी। उसका उस घड़ी से भावनात्मक जुड़ाव था और वह किसी भी कीमत पर उसे वापस पाना चाहता था। उसने घड़ी को पूरे घर में खोजा, पर वह उसे कहीं नहीं मिली। इससे वह परेशान हो गया। तभी उसे सामने मैदान में कुछ बच्चे खेलते हुए नजर आए। उसे लगा कि घड़ी खोजने में बच्चों की मदद लेनी चाहिए।

उसने बच्चों को अपने पास बुलाकर कहा, "सुनो बच्चो, मेरी घड़ी घर में कहीं गुम हो गई है। तुममें से जो कोई भी उसे खोज निकालेगा, उसे मैं 100 रुपए इनाम दूंगा।" फिर क्या था, सभी बच्चे जोर-शोर से इस काम में जुट गए। उन्होंने घड़ी को घर में हर जगह ढूंढा, पर वह उन्हें नहीं मिली। मायूस होकर जब बच्चे जाने लगे, तभी उनमें से एक लड़का उस व्यक्ति के पास आया और बोला,"काकाजी, मुझे एक मौका और दीजिए। पर इस बार मैं यह काम अकेले ही करना चाहूंगा।"

घड़ी मिलने की उम्मीद टूट चुकी थी, फिर भी उसने लड़के की बात मानते हुए हामी भर दी। इसके बाद वह लड़का घर के कमरों में एक-एक कर गया। जब वह उस व्यक्ति के शयनकक्ष से निकला तो घड़ी उसके हाथ में थी। घड़ी देख वह व्यक्ति प्रसन्न हो गया और उसने लड़के से अचरज से पूछा-"बेटा, कहां थी यह घड़ी? हम सभी नाकाम हो गए, आखिर तुमने इसे कैसे ढूंढ निकाला?"

लड़का बोला, "बस मैं कमरे में गया और घड़ी की आवाज पर ध्यान केंद्रित करने लगा। कमरे में शांति होने के कारण मुझे घड़ी की टिक-टिक सुनाई दे गई, जिससे मैंने उसकी दिशा का अंदाजा लगा लिया और अलमारी के पीछे गिरी इस घड़ी को खोज निकाला।"

जीवन का मूल्य


What do we think is the value of our life? Here is an inspiring short story that answers this question beautifully. 

दीपक अपने गुरु के पास गया और पूछा, “गुरूजी जीवन का मूल्य क्या है ?”
गुरू ने उसे एक नग दिया और कहा जाओ इस नग का मूल्य पता करो लेकिन ध्यान रहे कि नग को बेचना नही है।

दीपक नग को बाजार मे लेकर पहुंचा और एक फल वाले को दिखा कर पूछा, "बताओ इसकी कीमत क्या है ?" फल वाला चमकीले नग को देखकर बोला, “बारह संतरे ले जाओ और इसे मुझे दे दो।" दीपक फल वाले से बोला, "गुरूजी ने कहा है इसे बेचना नही है।"

और आगे एक सब्जी वाले के पास गया और उसे नग दिखाया। सब्जीवाले ने उस चमकीले नग को देखकर कहा, "एक बोरी आलू ले जाओ और इस नग को मेरे पास छोड़ जाओ।" दीपक ने कहा, “मुझे इसे बेचना नही है मेरे गुरूजी ने मना किया है।"

आगे एक सुनार के पास गया और उसे नग दिखाया। सुनार उस चमकीले नग को देखकर बोला, "पचास लाख मे बेच दो।" उसने मना कर दिया तो सुनार बोला, "दो करोड़ मे दे दो या बताओ इसकी कीमत, जो माँगोगे वह दूँगा।" दीपक ने सुनार से कहा, "मेरे गुरूजी ने इसे बेचने से मना किया है।"

आगे हीरे बेचनेवाले एक जौहरी के पास गया और् उसे नग दिखाया। जौहरी ने जब उस बेशकीमती नग को देखा तो पहले उसने नग के पास एक लाल कपडा बिछाया, फिर उस नग की परिक्रमा लगाई, माथा टेका, फिर जौहरी बोला, "कहाँ से लाये हो यह नग? सारी कायनात, सारी दुनिया को बेचकर भी इसकी कीमत नही लगाई जा सकती ये तो बहुमूल्य है।"

दीपक हैरान परेशान होकर सीधे गुरू के पास गया, अपनी आपबीती बताई और बोला, "अब बताइये गुरूजी मानव जीवन का मूल्य क्या है?"

गुरू बोले, "तुमने पहले नग को फल वाले को दिखाया, उसने इसकी कीमत बारह संतरे की बताई। आगे सब्जीवाले के पास गये उसने इसकी कीमत एक बोरी आलू बताई। आगे सुनार ने दो करोड़ बताई और जौहरी ने इसे बहुमूल्य बताया। ऐसे ही तुम्हारे जीवन का मूल्य खुद तुम पर निर्भर करता है - इसे तुम बारह संतरे मे बेच दो या एक बोरी आलू मे या दो करोड़ मे या फिर इसे बहुमूल्य बना लो, ये तुम्हारी सोच पर निर्भर है कि तुम अपने जीवन को किस नजर से देखते हो।"